अशोक पेपर मिल, हायाघाट (दरभंगा): गौरवशाली इतिहास से वीरानी तक, अब फिर जगेगी उम्मीद ?मिथिला की औद्योगिक पहचान का उत्थान और पतन

दरभंगा/हायाघाट। एक समय था जब दरभंगा जिले के हायाघाट स्थित अशोक पेपर मिल उत्तर बिहार की औद्योगिक पहचान हुआ करती थी। यहां बनने वाले उच्च गुणवत्ता के कागज की मांग देश के कई राज्यों में थी। हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार देने वाली यह फैक्ट्री आज खंडहर में तब्दील हो चुकी है। हालांकि हाल के वर्षों में इसके विशाल भू-भाग पर नए उद्योग स्थापित करने की चर्चाओं ने फिर से लोगों की उम्मीदें जगा दी हैं।
स्थापना और स्वर्णिम दौर
अशोक पेपर मिल की स्थापना दरभंगा राज परिवार द्वारा 1950 के दशक में हायाघाट के रामेश्वर नगर में की गई थी। इसे उत्तर बिहार के सबसे बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों में गिना जाता था। मिल के परिसर में हजारों श्रमिक कार्यरत थे और यहां उत्पादित कागज अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध था।
मिल का विस्तार सैकड़ों एकड़ भूमि में था और इसने आसपास के गांवों की आर्थिक तस्वीर बदल दी थी। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला, बाजार विकसित हुए और हायाघाट क्षेत्र औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र बन गया।
बंदी की शुरुआत
1970 के दशक के उत्तरार्ध से मिल की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी। भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन, बिजली संकट, कच्चे माल की कमी और वित्तीय समस्याओं के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ। अंततः 1982 में उत्पादन बंद हो गया और मिल बीमार उद्योग की श्रेणी में पहुंच गई।
मिल के बंद होने से हजारों श्रमिक बेरोजगार हो गए और पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा। कई परिवारों को रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करना पड़ा।
पुनर्जीवन के प्रयास और निजीकरण
अशोक पेपर मिल को पुनर्जीवित करने के लिए श्रमिक संगठनों ने लंबे समय तक आंदोलन किया। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। इसके बाद 1990 के दशक में मिल के पुनरुद्धार के लिए निजीकरण का रास्ता अपनाया गया और मुंबई की कंपनी Nouveau Capital & Finance Limited (NCFL) को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।
कुछ समय के लिए उत्पादन दोबारा शुरू भी हुआ, लेकिन वित्तीय विवाद, श्रमिक समस्याएं और प्रबंधन संबंधी आरोपों के बीच यह प्रयास सफल नहीं हो सका। अंततः 11 नवंबर 2003 को मिल फिर से बंद हो गई और उसके बाद से उत्पादन शुरू नहीं हो पाया।
वर्तमान स्थिति
आज अशोक पेपर मिल का विशाल परिसर अधिकांशतः वीरान पड़ा है। कभी जहां मशीनों की आवाज गूंजती थी, वहां अब जर्जर भवन, बंद फैक्ट्री शेड और उगी हुई झाड़ियां दिखाई देती हैं। श्रमिकों और स्थानीय लोगों द्वारा समय-समय पर इसके पुनरुद्धार की मांग उठती रही है।
हालांकि वर्ष 2025 में बंद पड़ी मिल की जमीन पर ड्रोन निर्माण संयंत्र स्थापित करने की संभावना को लेकर निरीक्षण किया गया था। इसके अलावा जनवरी 2026 में बिहार सरकार ने मिल की लगभग 280 एकड़ भूमि अधिग्रहित कर नए उद्योग स्थापित करने की घोषणा की, ताकि क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकें।
क्या फिर लौटेगी रौनक?
अशोक पेपर मिल केवल एक फैक्ट्री नहीं, बल्कि मिथिला की औद्योगिक विरासत का प्रतीक रही है। यदि सरकार की नई औद्योगिक योजनाएं धरातल पर उतरती हैं तो दशकों से बंद पड़े इस परिसर में फिर से रोजगार और विकास की नई कहानी लिखी जा सकती है। स्थानीय लोगों की उम्मीद है कि जिस भूमि ने कभी हजारों परिवारों का जीवन संवारा था, वह एक बार फिर उत्तर बिहार के औद्योगिक विकास का केंद्र बनेगी।